Thursday, 5 May 2016

                                कड़कती धूप में 'हिमगिरी' की खोज

ट्रेनिंग ट्रेनिंग ट्रेनिंग यह शब्द एग्जाम के बाद से हे दिमाग में ऐसे उछल कूद मचा रहे थे जैसे चूहेदानी में बंद चूहा। क्या होगा? कैसे होगा? कहाँ होगा? इन सब के बारे में ज्यादा तो नहीं पता था। मगर हिमगिरी का नाम बड़ा सुना था। ये नाम अपने विभागाध्यक्ष डॉ. सुखनंदन सर से सुना था। कमाल के शख्स हैं। उन्हें प्रकृति पहाड़ एडवेंचर बहुत पसंद है। जैसा उनका स्वभाव उसी के अनुरूप उन्होंने मुझे रेडियो के ट्रेनिंग के लिए जगह का नाम बताया। मुझे हिमगिरी के बारे में कुछ भी पता नहीं था सिवाय नाम के अलावां सोचा चलो आज हिमगिरी की खोज कर लेते हैं। यही सोच देव संस्कृति विश्वविद्यालय से निकल पड़ी। इस चिलचिलाती धूप में गाड़ी मोटरों की भीड़ भाड़ में और सबसे बड़ी बात ऑटो की हड़ताल में ऑटो का मिलना मुश्किल सा लग रहा था।
नजरें फ़ोन में थी। उँगलियाँ स्क्रीन पर ऊपर नीचे कर रही थी की इतने में तेज हार्न की आवाज सुनाई दी।
मैंने हडबडा कर सामने देखा तो ऑटो वाला पूछा- मैडम जी किधर जाना है?
भैया रायवाला। कितना लोगे? मैंने पूछा।
दस रुपये इतना सुन ऑटो में बैठ गयी। ऑटो में बैठ कर थोड़ी धूप से राहत तो मिली मगर मन उधेड़ बून में लगा रहा।
लो जी आ गया रायवाला। ड्राइवर की आवाज आई। रोड पर उतर कर सामने देखा तो एक पतले से बोर्ड पर जो जंग से लिपटा हुआ था। उस पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था- रायवाला जंक्शन।
मैंने रोड के दोनों तरफ नज़र घुमाया और तेज कदमो से चलकर सड़क के उस पार स्टेशन के गेट पर पहुंच गई। ट्रेन आने में वक्त था अभी। शायद उत्सुकता में ज्यादा ही पहले आ गयी थी। इंतजार करने के अलावा कोई चारा भी नहीं था। टिकट लेने के बाद ट्रेन के इन्तजार में कभी कलाई पर बंधी घड़ी को देखती तो कभी प्लेटफार्म पर।
थोड़ी देर में सायं सायं की आवाज करती ट्रेन प्लेटफार्म पर आ गई। भीड़ देख कर तो पसीने छुट रहे थे। थोड़ी जगह देखने के चक्कर में दो चार डिब्बे में झांकते झांकते आगे बढ़ी तो एक डिब्बे में थोड़ी जगह दिखाई दी इतने में ट्रेन की सीटी बज गई। सीट पर बैठते ही आंखे नींद लेने के लिय्रे बेचैन हो उठी। फिर क्या था आँख तब खुली जब आस पास के लोगों की आवाजें आने लगी।
चलो चलो भाई उतरो उतरो...हमें भी उतरना है। अरे हाँ भैया आ गया देहरादून..। अरे बहन जी जरा पैर हटाओ यह आवाज मेरे बगल में बैठे अंकल की थी। दिखने में तो मेरे पिता के उम्र से बड़े लग रहे थे। मगर मुझे बहन जी बोल रहे थे। शुक्र है वो तो बहन जी बोल रहे थे वरना आज कल के ज़माने में लोग बहन बोलना कहाँ पसंद करते हैं।
खैर मैंने भी अपना पर्स उठाया और प्लेटफोर्म पर उतर गई। आब आगे का रास्ता बताने में फ़ोन ही मदद कर सकता था इसलिए नजरें फ़ोन में हे टिकी थी किसी ऐसे नम्बर का तलाश कर रही थी जो हिमगिरी का पता दे सके।
क्यों न अपने सर को फ़ोन मिलाये..ऐसा मन में ख्याल आया। मैंने तुरंत सर को फ़ोन लगाया। मेरे कदम आगे की ओर बढ़ते जा रहे थे। घंटी जाने की आवाज मेरे कानो में आ रही थी की इतने में आवाज आई..हेलो...मैंने झट से बोला सर मैं स्नेहा बोल रही हूँ..सर आपने हिमगिरी के बारे में बताया था न ट्रेनिंग के लिए..मैं जाने के लिए निकली हूँ..आपके पास वहां के किसी स्टाफ का नम्बर है क्या? जिससे मैं संपर्क कर वहां जा सकूँ।
सर ने कहा- हाँ हाँ होल्ड कीजिये देता हूँ..
थोड़ी देर के इन्तजार के बाद किसी अमर सर का नम्बर मिला। मैंने सर का शुक्रिया अदा कर फ़ोन काट दिया। मैंने तुरंत अमर सर का नम्बर लगाया।
हेलो.. अमर सर की आवाज थी। मैंने बोला सर मैं स्नेहा शर्मा देव संस्कृति विश्वविद्यालय से। सर रेडियो में ट्रेनिंग के लिए बात करनी थी।
सर- अच्छा हाँ हाँ...आपके सर से बात हुई थी। मगर स्नेहा मैं तो अभी बहार हूँ आप एक काम कीजिये मैं संजीव सर का नम्बर मेसेज करता हूँ, वो वहां पर RJ हैं।आप उनसे बात कर लीजिये।
ओके थैंक यु सर।
तभी याद आया अरे पता तो पूछ लूं। मैंने तुरंत बोला सर सर क्या आप बता सकते हैं हिमगिरी कैसे जा सकते हैं?
सर ने पता बताया।
फिर मैंने बल्ली वाला चौक आकर विकास नगर के लिए बस लिया।सीट तो मिली नहीं। खड़े खड़े जाना पड़ा। मैंने पास में खड़े एक जनाब से पूछा- एक्सक्यूज मी भईया, ये हिमगिरी कितनी देर के बाद आएगा बता पाएंगे?
जी मगर अभी आगे है आते ही बता दूंगा
नजरें खिड़की के बाहर ही थी की इतने में एक नीले रंग का बोर्ड दिखा जिस पर बड़े बड़े सफ़ेद अक्षरों में लिखा था हिमगिरी zee पूरा नाम तभी पता चला। भैया रोक दो। मैंने ड्राइवर को बोला। बस से उतर कर देखा तो पता चला मेरे और हिमगिरी के बीच ६०० मीटर की दुरी है। आस पास जंगल, सुना रास्ता, इक्का दुक्का गाड़िया। तभी याद आया संजीव सर को तो फ़ोन कर लूं।
सर के फैन होने के लिए उनकी आवाज ही काफी थी RJ जो थे संजीव सर से बात करते करते पता हे नहीं चला की कब हिमगिरी के सामने आ गयी
आख़िरकार मिल ही गयी हिमगिरी














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