पहली
बार जब टीवी देखा
मुझे
याद है वो दिन जब काले रंग के
एक बॉक्स में एक मोटे से शीशे
के पीछे कुछ लोगों को आपस में
बातें करते हुए देखा था.
कभी
वो हमारी तरफ देखते तो कभी आपस
में,
कभी
वो मार पीट करते तो कभी गले
मिलते,कभी
हंसते तो कभी रोते,
मुझे
बड़ा मजा आता था जब किसी गुंडे
की पिटाई होती थी,
मैं
खुश होकर तालियाँ बजाती,जब
वो हंसते तो मेरे चेहरे पर
हंसी देखने को मिलती और वो कभी
रोते तो मेरे चेहरे पर भी मायूसी
छा जाती और कभी कभी तो हद ही
हो जाती थी जब मेरे आँखों में
आंसू आ जाते थे किसी सीन को
देख कर.
मैं
अपने अगल बगल वालों की आँखों
में झाँक कर देखती की कही मैं
अकेले रोने वालों में से तो
नहीं.सब
कुछ काले व सफ़ेद रंग में दीखता
था.जब
कभी उस शीशे पर काले सफ़ेद रंग
के बिंदु दिखाई देने लग जाते
थे जिन्हें हम मच्छर बोलते
थे.
उन
मच्छरों के आने के बाद उन चार
पांच डंडो से मिलकर बने स्टैंड
को इधर उधर घुमाते देखा था,
इसलिए
जब कभी ऐसा होता मैं छत पर भाग
कर जाती और उन डंडों को हिला
कर आ जाती.
बाद
में पता चला वो टीवी का एंटीना
था .....
स्नेहा
शर्मा
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